Breaking News

आज़ाद भारत का किसान: कल और आज

विशेष: यह जानते हुए कि किसी के पास भी लंबे लंबे लेख पढ़ने की फुरसत नहीं है, फिर भी पोस्ट करने यह खतरा उठाया है, क्योंकि समस्या भी तो उतनी ही बड़ी और डरावनी है।

साभार: फैजान अंसारी

साठ के दशक में पी एल 480 के तहत चलाया गया “शांति के लिए अन्न” नामक कार्यक्रम के चलते अमरीका से मिलने वाला गेहूं और तनिक लाल आभा लिए हुए उसका आटा क्या याद है किसी को? बहुत कम लोग बचे होंगे अब जिन्होंने देश में अनाज की कमी के चलते लगभग भुखमरी का वह दौर देखा होगा। उक्त कार्यक्रम के तहत मदद के तौर पर अमरीका यहां गेहूं भेजा करता था (इसकी आड़ सीआईए में द्वारा जासूसी के पंजे फैलाने का आरोप भी तब खूब चलन में था) इसी पृष्ठभूमि में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देशवाशियों से सोमवार के दिन एक समय भोजन न करने की अपील की थी। दोपहर के बाद सभी ढाबे बंद हो जाया करते थे।

हरित क्रांति

ऐसे में स्थापना हुई लुधियाना में पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की, देखते ही देखते इसने देश के पश्चिमोत्तर भाग में खेती-बाड़ी के तौर-तरीकों तथा पैदावार में एक युग परिवर्तन का सूत्रपात किया। जमीन पहले जितनी ही थी, लेकिन किसान की पैदावार उससे लगभग दो गुणी या उससे भी ज्यादा हो गई थी। नये बीज आ गए, नई खाद आ गई, बैलों के स्थान पर ट्रैक्टर और कम्बाइन हार्वेस्टर, हरहट की जगह बिजली व डीजल के पम्प से खेती की सिंचाई होने लग गई। वर्ष 1975 में तो गेहूं की इतनी भारी पैदावार हुई कि सरकार ने गेहूं का आयात ही बंद कर दिया। किसान को सहसा विश्वास नहीं हो रहा था उसके गेहूं की कीमत 250 रुपये बोरी को भी पार कर गयी है।

अपनी बदली हुई स्थिति पर इतराता, फसल कटने के बाद बैसाखी के मेले में भांगड़े करता, पूरे परिवार के लिए दिल खोल कर खरीददारी करने वाला वही किसान आज 42 साल बाद कर्ज के बोझ तले कराहता हुआ आत्महत्या करता है। उसके बाद उसकी विधवा और बच्चों को किन किन हालात से गुजरना पड़ता है। देश के सुविधा संपन्न लोग तो उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। हालात में ऐसा अंतर क्यों और कैसे आ गया? आइए समझने का प्रयास करते हैं।

चार दशकों में आया अंतर:

1975 में गेहूं की जिस बोरी की कीमत 250 हो जाने पर वह खुशी से नाचने लगता था, वही किसान आज 2018 में उसी गेहूं की बोरी की कीमत 1735 रुपये हो जाने के बावजूद अपना सर धुनता है हालांकि यह बढ़ोत्तरी लगभग सात गुणा हो गई है। बहुत से शहरी लोगों को यह भी आपत्ति है कृषि आय पर आयकर भी नहीं लगता।

लेकिन सरकारी सेवा की क़ीमत तो उस समय की तुलना में “40 से लेकर 90 गुणा तक बढ़ चुकी है।

और अधिक फसल पाने के लालच में किसान ने अंधाधुंध जमीन से पानी का दोहन किया तो पानी का स्तर नीचा और नीचा होता गया। और अधिक रासायनिक खादों का इस्तेमाल किया तो फसल के पौष्टिक तत्व ही नष्ट होने लगे। जमीन का उपजाऊपन खत्म होने लगा तो वह और भी ताकतवर खाद का इस्तेमाल करने लगा ठीक एंटीबायोटिक दवा की तरह, जिसकी पोटेंसी डॉक्टर बराबर बढ़ाता रहता है। जमीन का उपजाऊपन बढ़ाने का एक पारम्परिक तरीका हुआ करता था कि कुछ समय के लिए जमीन को खेती से छुट्टी दे दी जाती थी और छुट्टी बिता कर तरोताजा काम पर लौटे आदमी की तरह ही जमीन का भी उत्साह और उपजाऊपन बढ़ जाता था। लेकिन अधिक फसलें लेने का लालच उसे यह नहीं करने देता था। इसी का परिणाम था और महंगी खाद और बीज जिन पर धीरे धीरे कार्पोरेट वर्ग का अधिकार होता चला जा रहा था।

खेती के औजार मुहैया कराने वाला गांव का लोहार और बढ़ई तो अब गए जमाने की बात हो गए। जिनसे सारे गांव का भैया, काका, ताऊ और दद्दु का रिश्ता हुआ करता था। खेती के लिए अब तरह तरह की मशीनों का प्रयोग होने लगा। एक से बढ़ कर एक अनोखे कारनामें करती मशीनों का अविष्कार होने लगा। लालच में अंधा हो चुका किसान औकात से बढ़ कर इन पर खर्च करनेे के लिए तैयार हो गया।

कृषि उद्योग का कार्पोरेटीरण:

दूसरे शब्दों में बीज और खाद से लेकर खेती की मशीनों तक खेती धीरे धीरे पूरी तरह बड़े उद्योगों की बनी वस्तुओं पर निर्भर होती चली गयी। खेती के इस नए कारोबार पर आधारित कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ने वाली देशी-विदेशी कंपनियों और उनकी तथा उनके उत्पादों की लगातार बढ़ती बाजार कीमतों से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका यह आश्चर्यचकित कर देने वाला चहुंमुखी विकास जिस कीमत पर हुआ है उसी का नाम है सरकारी उपेक्षा का शिकार किसान।

खेती के इनपुट्स और भारी उपकरणों पर पूरी तरह निर्भर किसान इतना मजबूर गो गया कि इन बड़े उद्योगों से किसी भी तरह के मोल-भाव करने की उसकी कोई औकात ही नहीं रही। उसके सामने केवल एक ही विकल्प था कि वह चुपचाप कार्पोरेट विश्व के इस विशाल यज्ञ की समिधा बनता चला जाए। लिहाजा इन इनपुट्स की क़ीमत इतनी बढ गई कि खेती एक नुक़सान का सौदा बन गयी। जबकि एग्रो-उद्योगपति रात दिन मालामाल होते गए। नतीजा यह हुआ कि किसान बराबर कर्ज में और गहरे डूबता गया।

कोढ़ में खाज तो यह कि इसी अवधि के दौरान खेती के लिए जरूरी जो सरकारी काम किए जाने चाहिए थे जैसे बिजली-पानी की व्यवस्था, अनुदानप्राप्त खाद, बीज एवं मशीनरी की व्यवस्था, वे तो लगभग न के बराबर ही किए गए। परिणाम यह हुआ कि किसान के खेत बंजर रहने लगे। इसके बावजूद कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस देश की सरकारी प्राथमिकताओं में तो किसान या खेती का तो कहीं नामोनिशान ही नहीं था। उसे तो फिक्र थी केवल और केवल उद्योगपतियों की। ये थैलीशाह पहले तो रुपए-पैसे से अनुकूल पार्टियों की मदद करके, उन्हें अहसान तले दबा देते हैं, और फिर उनके सत्ता में आने पर ब्याज सहित इन सारे अहसानों की कीमत वसूली जाती थी। लेकिन अब तो यह दौर भी बीत गया है। अब तो वे स्वयं अर्थव्यवस्था की ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गए हैं और नीति निर्धारण में दखल दे रहे हैं। सरकार में जब उद्योगपति स्वयं आ कर बैठ जाएगा तो आप और किस परिणाम की उम्मीद कर सकते है?

अपने-अपने स्वार्थ:

असली और सारी समस्या तो अब अपने अपने स्वार्थ की है। उद्योगपति अपने मुनाफे को रात दिन बढ़ाना चाहता है। वह तो चैंबर ऑफ कॉमर्स के माध्यम से संगठित भी है। उसने तो सभी बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थाओं को अपने हित के लिए साध भी लिया है। कोर्ट, पुलिस, और कई अर्ध-सैनिक बलों को भी अपनी सुरक्षा में तैनात कर लिया है। कारोबारी एक्जिक्यूटिव बनाने वाले बेहतरीन अंग्रेजी माध्यम के निजी पब्लिक स्कूल और बेहतरीन डॉक्टरी व्यवस्था व सुविधाओं वाले अस्पताल केवल और केवल उसी के लिए आरक्षित हैं। देश के किसान की पहुंच से तो ये सब बहुत दूर चले गए हैं।

पूंजीपति समर्थक सरकार और किसान के बीच की दूरियां इतना बढ़ गयी हैं कि दोनों के बीच संवाद की कोई स्थिति ही नहीं रह गई है। मंदसौर में इन आंदोलनकारी किसानों पर गोली चलाया जाना तो बड़े फलक पर होने वाले घमामान की एक चेतावनी भर है। जो इसी संवाद के न होने का सीधा परिणाम है। किसान तो उसके लिए अब कच्चे माल की सप्लाई करने वाला एक छोटा-मोटा कारोबारी मात्र रह गया है। इसका एक सीधा परिणाम यह हुआ है कि सरकार आम जनता एवं किसान के प्रति असंवेदनशील हो गयी है। देश भर से कांग्रेस का नाम और निशान पूरी तरह मिट जाना इसी संवादहीनता और असंवेदी होने का ही नतीजा है। आम जनता से संवाद न रहने और असंवेदी हो जाने के चलते कांग्रेस से हुए आम जन के मोहभंग और देश की धार्मिक नसों को भड़काऊ नारों से उत्तेजित कर सत्ता में आयी भाजपा तो इस दृष्टि से कांग्रेस से भी दो-चार कदम आगे ही है। हां, उससे ज्यादा शातिर जरूर है कि कांग्रेस द्वारा तैयार की गई जमीन का भरपूर फायदा उठा ले। लेकिन वह भी अच्छी तरह जानती है वोट के लिए जनता को लगातार ख्वाब दिखाना बहुत जरूरी है। देशभक्ति,धर्म-संस्कृति की रक्षा से बड़ा और क्या सपना हो सकता है? लेकिन लगाव तो उसका उद्योगपतियों से ही रहेगा, बल्कि उसे कांग्रेस की तरह छिप कर यह सब करने की जरूरत ही नहीं रह गई, वह तो प्रचंड बहुमत के चलते खुल्लम-खुल्ला यह सब कर सकती है। उद्योगपति किसान को तब तक लूटता रहेगा जब तक उसकी पूरी की पूरी जमीन इन थैलीशाहों की तिजोरी में नही पहुंच जाती।

किसान के विकल्प:

ऐसी स्थिति में किसान क्या करे? देश की आम जनता क्या करे? केवल दो रास्ते दिखाई देते हैं। पहला तो यह ऐसे ही लुटता रहे, आपस में लड़ता रहे और सियासी तथा थैलीशाह गिद्धों को चुपचाप अपना शरीर नोचने दे। नकली नारों, वादों और शातिर इरादों की भूलभुलैया में भटक कर अपने ही भाई को अपना दुश्मन मानता रहे और आत्महत्या करता रहे। #

दूसरा रास्ता यह कि किसी भी कीमत पर जाति-धर्म, मंडल-कमंडल सब भूल कर अपने-पराए, दोस्त-दुश्मन की पहचान करे और ऐसा करके अपनी एकता को सुनिश्चित करे। अपने बच्चों का भविष्य सुनिश्चित करे। आप 70 साल से बूढ़े हो चुके नक़ली जनतंत्र को देख ही चुके हो। इसमें तो आपके बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं ही है। हालात जैसे हैं, उससे बुरे तो हो नहीं सकते। आपको अपनी ही पंचायतों पर भरोसा रख कर अदालतों, पुलिस, सरकारों एवं नेताओं का बहिष्कार करना पड़ेगा आज नहीं तो कल। हनुमान की तरह अपनी राजनैतिक ताकत को भूल चुके किसान को फिर से उसे याद करना होगा। आप संसद और विधानसभा पर विश्वास कर सकते हैं मगर बिना किसान नेताओं को, (याद रहे: खानदानी जिमीदारों के बेटों को नहीं) संसद और विधानसभा में भेजे।

देश के भविष्य के बारे में सोच कर जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने हर तरह की कुर्बानियां देने में गुरेज़ नहीं किया, देश की आम जनता के साथ ही अपने सपने, अपने सुख-दुख सब जोड़ दिए थे वे लगभग सभी 80 के दशक तक दुनिया छोड़ चुके हैं। आज का राजनेता तो अपने फायदे के लिए आपको भी बेच सकता है और देश को भी। फिर इनके लिए किसान है किस खेत की मूली। कोई अहमियत नहीं उसकी उनके स्वार्थ के आगे। इनसे बचने का एक ही रास्ता है कि सरकार पर किसानों का दबदबा हो। वह चाह कर भी उनकी उपेक्षा न कर सकें। किसान अपने विकास की योजनाएं खुद बनाएं।

दोस्तों, स्थायित्व का झुनझुना जो आपको थमा दिया गया है, वह आपको बेवकूफ बनाने का एक तरीका भर है वरना जापान में तो पांच साल में चार प्रधानमंत्री बदले जा चुके हैं। क्या जापान फिर से विकास की पटरी पर नहीं आया? देश की सैनिक जरूरतें पूरा करने वाला सच्चा देशभक्त तो सिर्फ और सिर्फ किसान ही है, बाकी तो मज़दूर या ख़रीद-फ़रोख्त करने वाले हैं। किसान अपने एकता की कीमत समझे और अपने देश की सत्ता को संभाले। यही वक्त का तकाजा है !

About adminfahad

x

Check Also

अब साल में दो बार होगी जेईई मेन (Engineering), नीट (Medical) परीक्षा, एग्जाम दे चुके छात्र फिर कर सकते हैं आवेदन

CBSE नहीं अब NTA (National ...

स्वर कोकिला लता मंगेशकर भाजपा अध्यक्ष नही मिलीं

फैसल खान मुम्बई। स्वर कोकिला ...

स्वास्थ केंद्र में कर्मचारियों की लापरवाही से गर्मी में तिलमिलाते रहे बच्चे व महिलाएं

रिपोर्टर: नीरज अवस्थी निघासन खीरी। ...

विभिन्न शहरों से मुम्बई तक चलेगी एसी बस

वाराणसी से मुबंई के लिए ...

कर्नाटक के भावी सीएम की पत्नियों का वो राज जो बहुत कम लोगों को पता है, जानें क्या है पूरा सच?

विशेष संवाददाता कर्नाटक में तमाम ...

%d bloggers like this: