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शशि थरूर का विवादित बयान और “हिन्दू पाकिस्तान”

फज़लूर्रहमान शैख़
expresssamachar.com

पूर्व केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर के उस बयान के बाद हंगामा मचा हुआ जिसमे उन्होंने आशंका जाहिर करते हुए कहा है कि अगर 2019 में भाजपा केन्द्र की सत्ता में पुनः आती है तो फिर भारत “हिन्दू पाकिस्तान” बन जाएगा। हालांकि उक्त बयान वास्तव में घोर निन्दनीय है। भारत की पाकिस्तान से तुलना कर देना, मौजूदा वक्त में ‘राष्ट्रवाद’ के उसूलों के खिलाफ है। लेकिन अगर हम थरूर के बयान को ज़मीन पर परखते हैं तो एहसास होता है कि थरूर के बयान में कुछ तो सच्चाई की झलक है। केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद जिस तरह से अल्पसंख्यकों (विशेषकर मुसलमानों) को निशाना बनाया गया है वह बताता है कि भारत वही राह अख्तियार कर रहा है जो पाकिस्तान में है। भारत में भी दक्षिणपंथ उतना ही हावी होता जा रहा है जैसा पाकिस्तान में हुआ था।

केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद सबसे पहली मॉब लिंचिंग पुणे में हुई जब एक दक्षिणपंथी संगठन के लोगों ने मोहसिन शेख नाम के युवक को सिर्फ इसलिये पीट-पीट कर मार डाला क्योंकि उसके चेहरे पर दाढ़ी थी, और वह नमाज़ पढ़कर लौट रहा था। यह घटना 2014 मे हुई थी, जब इस हत्या के आरोपियों ने अदालत में जमानत के लिये अर्जी डाली तो निचली अदालत ने उसे खारिज कर दिया। उसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा हाईकोर्ट ने इस मामले पर बड़ा अजीब फैसला दिया। हाईकोर्ट ने आरोपियों को जमानत देते हुए कहा था कि तीनों की ऐसा करने की कोई पहले से मंशा नहीं थी और न ही उनकी मोहसिन शेख से कोई दुश्मनी थी। मोहसिन का गुनाह सिर्फ यह था कि वह दूसरे धर्म से था। (हमें लगता है कि यह बात आरोपियों के पक्ष में जाती है।) हाईकोर्ट की टिपप्णी सिर्फ यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि आगे कहा गया, तीनों का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और तीनों धर्म के नाम पर उकसावे में आकर ऐसा किया था। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को चेतवानी देते हुए कहा था कि ऐसी टिप्पणी करने से बचे क्यों की भारत बहुलतावादी देश है। इस तरह की टिप्पणी से अपराधियों के हौसले बढ़ सकते हैं।

वक्त बीतता गया और घटनाओं का सिलसिला बढ़ता गया

मोहिसन शेख की हत्या के बाद 2015 में उत्तर प्रदेश के दादरी में अखलाक की हत्या हुई, इस हत्या का जो सबसे चिंताजनक पहलू है वह यह है कि यह हत्या एक ऐसी भीड़ ने की जो उन्हीं के गांव की थी, और यह हत्या अखलाक के फ्रीज में गौ-मांस होने के शक की अफवाह पर हुई। मंदिर से ऐलान किया गया, और एक भीड़ ने जाकर अखलाक की पीट-पीट कर हत्या कर दी। उसके कुछ समय बाद अखलाक परिवार पर गौ-हत्या का मुकदमा भी दर्ज कर दिया। फिर गौमांस के नाम पर की जाने वाली हत्याओं का सिलसिला शुरू हो गया। झारखंड, असम, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में गाय के नाम पर इंसानों की हत्याएं की गईं। हत्यारोपियों का महिमामंडन किया गया, उन्हें क्रान्तिकारी, धर्म रक्षक यहां तक कि भगत सिंह कहकर संबोधित किया गया। यह सिलसिला अभी थमा नहीं है।

हरियाणा में एक 18 वर्षीय नौजवान जुनैद की दिल्ली से अपने घर लौटते वक्त यात्रियों से खचाखच भरी ट्रेन में हत्या सिर्फ इसिलये हत्या कर दी गई क्योंकि उसके हत्यारोपियों को उसके सर पर लगी टोपी, हल्की दाढ़ी, और उसके धर्म से नफरत थी। यह नफरत किसने भरी इसे बताने की जरूरत नही है। जुनैद की हत्या की घटना की गंभीरता को सिर्फ इसी से समझा जा सकता है, कि उसके पेट में चाकू मारन वाले बार बार उसके धर्म और गाय को लेकर उससे नफरत का इजहार कर रहे थे। इस हत्या में 55 साल के वृद्ध से लेकर दिल्ली में सरकारी नौकरी करने वाला युवक भी शामिल था। इन सब घटनाओं से समझा जा सकता है कि नफरत कहां तक पहुंचाई जा चुकी है। इसके अलावा यात्रियों से खचाखच भरी ट्रेन में जुनैद की हत्या हो जाना और किसी भी यात्री की तरफ से एक मरते हुए नौजवान की मदद न करना, और हत्यारों का विरोध न करना यह बताता है कि कट्टरता कहां तक पहुंच चुकी है? इसके दो ही कारण या तो उन यात्रियों को इस बात की फिक्र थी क्यों लफड़े में पड़ा जाये, या फिर वे भी यही चाहते थे कि मरने वाला दूसरे समुदाय का है उनका अपना नही।

बीते साल दिसंबर में राजस्थान के राजसमंद में एक 52 वर्षीय बंगाली मजदूर की शंभू रेगर नाम के युवक ने बर्बरतापूर्व हत्या कर दी, उसने उस हत्या का वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करके अपनी बहादुरी का परिचय दिया। लेकिन जब पुलिस ने शंभू रेगर को गिरफ्तार किया तो हिन्दूवादी संगठनों ने तांडव मचा दिया। सोशल मीडिया पर मुसलमानों को गालियां देकर खुद को हिन्दू धर्म रक्षक के तौर पर पेश करने वाले उपदेश राणा और उसके साथियो ने रासमंद में बर्बर हत्यारे शंभू रेगर के लिये रैली निकालने का एलान किया। हालांकि पुलिस ने उनकी कोशिश नाकम कर दी और उन्हें राजसमंद जाने से रोक लिया गया। लेकिन इसके बावजूद राजसमंद में एक हत्यारे के लिये ऐसा तांडव मचाया गया कि दो दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी उन लोगों के वार से घायल हो गए जो एक हत्यारोपी के लिये रैलियां निकाल रहे थे। हद तब हो गई जब एक हिन्दूवादी युवा जोधपुर कोर्ट की छत पर भगवा झंडा लेकर चढ़ गया। इसी साल जनवरी में जम्मू में एक बच्ची के साथ मंदिर परिसर में दरिंदगी की गई, जिसमें मंदिर का पुजारी, और पुलिसकर्मी को भी शामिल होने का आरोप है। फिर वही हुआ जैसा राजस्थान के जोधपुर, राजसमंद में हुआ था, कथित हिन्दूवादियो ने बलात्कार और हत्या के आरोपियो को बचाने के लिये तिरंगा यात्रा निकाली जिसमें भाजपा के मंत्री विधायक, और छुटभैय्या नेता तक ने शिरकत की, ऐसा पहली बार हुआ जब देश में संवेदनाऐं पीड़ित के लिये नहीं बल्कि हत्यारोपियों और बलात्कारियों के लिये देखी गईं। जब तिरंगा यात्रा आठ साल की बच्ची को इंसाफ दिलाने के लिये नहीं बल्कि उसके गुनहगारों का महिमामंडन करने के लिये निकाली गई।

वह रास्ता जो ‘हिन्दु पाकिस्तान’ की तरफ जाता है:

शशि थरूर का कहना कि भारत हिन्दू पाकिस्तान बन जायेगा अगर भाजपा 2019 में सत्ता में वापसी करेगी। अब यह तो वक्त ही बतायेगा कि 2019 कौन जीतेगा और कौन हारेगा? लेकिन जहां तक सवाल हिन्दू पाकिस्तान बनने का है तो उसकी शुरूआत तो कई साल पहले हो चुकी है। जब मंदिर से ऐलान करके अखलाक की हत्या की जाती है, तो वह पाकिस्तान के ईसाई दंपत्ती शाहजाद और शमा की हत्या की याद दिलाती है, जिन पर ईशनिंदा का आरोप लगाया, मस्जिद से एलान किया गया था, और भीड़ ने पहले दंपति को बेरहमी से पीटा और फिर उन्हें ज़िंदा ही ईंट-भट्टे में झोंक दिया था।
जब गौरी लंकेश की हत्या सिर्फ इसलिये कर दी जाती है क्योंकि वह हिन्दुत्व की राजनीति के खिलाफ थीं, तो वह हत्या पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोप में हुई पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या की याद दिलाती है। जिन्हें उन्हीं के अंग रक्षक मुमताज कादरी ने गोलियों से भून दिया था और खुद को ‘सच्चा’ मुसलमान साबित किया था।
जब अफराजुल के हत्यारोपी की झांकी निकाली जाती है, और उसे हिन्दू बहनों का रक्षक बताया जाता है, तब पाकिस्तान की घटना आती है, जब अखलाक के हत्यारोपी रवी की जेल में डेंगू के कारण हुई मौत पर भी तांडव मचाया जाता है, और उसकी लाश को तिरंगे से ढका जाता है और केन्द्रीय मंत्री उसकी लाश पर जाकर नमन करते हैं। वह पाकिस्तान के मुमताज कादरी के जनाजे में शामिल भीड़ की याद दिलाती हैं। दरअस्ल मुमताज कादरी को सलमान तासीर की हत्या का दोषी मानते हुए पाकिस्तान की अदालत ने सजा ए मौत दी थी, लेकिन उसके जनाजे में लगभग पचास हजार लोग शामिल हुए जिन्होंने मुमताज कादरी को ‘शहीद’ बताया। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह अखलाक के हत्यारोपी की लाश पर तिरंगा चढ़ा दिया गया था।
जब मेवात के पहलू खान को गाय के नाम पर मार दिया जाता है, और उसके हत्यारोपियों को एक तथाकथित साध्वी द्वारा भगत सिंह कहकर पुकारा जाता है। जब अलीमुद्दीन की हत्या में दोषी पाये जाने वाले लोग जमानत पर जेल से बाहर आते हैं तो उनका फूल मालाओं से स्वागत भारत सरकार का एक मंत्री करता है, जो हॉवर्ड की डिग्री लेकर आया था। पाकिस्तान में हाफिज सईद दक्षिणपंथ को बढ़ावा देता है, तो उसे हम आतंकवादी कहते हैं, लेकिन भारत मे रहकर जो लोग दक्षिणपंथी कट्टरता, नफरत को बढ़ावा देते हैं उन्हें राष्ट्रवादी कैसे कह सकते हैं? मोदी सरकार में मंत्री अनंत कुमार हेगड़े इस्लाम मुक्त और मुसलमान मुक्त भारत की बात करते हैं तो उन्हें मंत्रालय दिया जाता है। बीते चार सालो में कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट आई हैं जिनमें बताया गया है कि भारत में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं, उन्हें आतंकित करनें में इजाफा हुआ, कुछ साल पहले तक ऐसी ही रिपोर्ट पाकिस्तान के लिये आतीं थीं। पाकिस्तान की सरकारें पाकिस्तान में धर्म के नाम पर की जाने वाली अल्पसंख्यकों की हत्या पर उसी तरह खामोश रहती है जिस तरह मौजूदा भारत सरकार भारत मे गाय के नाम पर की जाने वाली हत्याओं पर खामोश रहती है। और सरकार के सदस्य बजाय पीड़ित परिवार से मिलने के हत्यारों का फूल मालाओं से स्वागत करते हैं। शशि थरूर गलत हैं जो कहते हैं कि 2019 में अगर भाजपा जीती तो भारत हिन्दू पाकिस्तान बन जायेगा, जबकि सच्चाई यह है कि भारत में सरकारी संरक्षण में फल फूल रहे दक्षिणपंथ की योजना भारत को म्यांमार बनाने की है, और भारत के मुसलमानों को रोहिंग्या मुसलमान बनाने की है। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भी भारत में हो बढ़ रहे दक्षिणपंथ को लेकर भारत की आलोचना होती रही हैं, लेकिन उसके बावजूद मौजूदा सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। सरकार को सोचना होगा कि अगर देश को विकसित बनाना है तो फिर दंगा, फसाद, दक्षिणपंथ के समर्थकों पर लगाम लगानी होगी, अभी भी वक्त है।

बकौल वसीम बरेलवी:

ये न हो कि फिर किसी पानी के बस की न रहे।
तुमने जो आग लगाने की कसम खाई है।

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