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नही रहे महाकवि गोपालदास नीरज

एखलाक खान

expresssamachar.com

 

हिंदी साहित्य के जाने माने कवी गोपाल दास नीरज दुनिया को अलविदा कह गए। (इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में।)

गोपाल दास नीरज का यह शेर मुशायरों में फरमाइश पर सुनाया जाता है. गोपालदास हिन्दी साहित्यकार, शिक्षक, कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक एवं फ़िल्मों के गीत लेखक रहे. वे पहले व्यक्ति हैं जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया। पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। चार जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के गांव पुरावली में जन्में गोपाल दास नीरज को फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला। पेश हैं उनके लिखे वे गीत जो दशकों से टॉप गानों की लिस्ट में शुमार हैं।

लिखे जो ख़त तुझे,
वो तेरी याद में,
हज़ारों रंग के,
नज़ारे बन गए,
सवेरा जब हुआ, तो फूल बन गए
जो रात आई तो,सितारे बन गए

कोई नगमा कहीं गूँजा, कहा दिल ने के तू आई
कहीं चटकी कली कोई, मैं ये समझा तू शरमाई।
कोई ख़ुशबू कहीं बिख़री, लगा ये ज़ुल्फ़ लहराईफ़िज़ा रंगीं अदा रंगीं, ये इठलाना ये शरमाना
ये अंगड़ाई ये तनहाई, ये तरसा कर चले जाना
बना दे ना कहीं मुझको, जवां जादू ये दीवानाजहाँ तू है वहाँ मैं हूँ, मेरे दिल की तू धड़कन है
मुसाफ़िर मैं तू मंज़िल है, मैं प्यासा हूँ तू सावन है
मेरी दुनिया ये नज़रें हैं, मेरी जन्नत ये दामन है

दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है-दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है
शब ये ग़ज़ल है सनम
गैरों के शेरों को ओ सुनने वाले
हो इस तरफ़ भी करम(आके ज़रा देख तो तेरी खातिर
हम किस तरह से जिये) – २
आँसू के धागे से सीते रहे हम
जो ज़ख्म तूने दिये
चाहत की महफ़िल में ग़म तेरा लेकर
क़िस्मत से खेला जुआ
दुनिया से जीते पर तुझसे हारे
यूँ खेल अपना हुआ …(ये प्यार हमने किया जिस तरह से
उसका न कोई जवाब) – २
ज़र्रा थे लेकिन तेरी लौ में जलकर
हम बन गए आफ़ताब
हमसे है ज़िंदा वफ़ा और हम ही से
है तेरी महफ़िल जवाँ
जब हम न होंगे तो रो रोके दुनिया
ढूँढेगी मेरे निशां …(ये प्यार कोई खिलौना नहीं है
हर कोई ले जो खरीद) – २
मेरी तरह ज़िंदगी भर तड़प लो
फिर आना इसके करीब
हम तो मुसाफ़िर हैं कोई सफ़र हो
हम तो गुज़र जाएंगे ही
लेकिन लगाया है जो दांव हमने
वो जीत कर आएंगे ही …

स्वप्न झड़े फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये श्रृंगार सभी, बाग के बबूल से
और हम खड़े खड़े, बहार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहेआँख भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक़ उठे कि ज़िंदगी फ़िसल गई
पात पात झड़ गए कि शाख-शाख जल गई
चाह तो निकल सकी (न पर उमर निकल गई) – २)
गीत अश्क बन गए, स्वप्न हो दफ़न गए
साथ के सभी दिये, धुआं पहन-पहन गए
और हम झुके-झुके, मोड़ पर रुके-रुके
उम्र की चढ़ाव का उतार देखते रहे, कारवाँ गुज़र…क्या शबाब था कि फूल फूल प्यार कर उठा
क्या कमाल था कि देख आइना सिहर उठा
इस तरफ़ ज़मीन और आसमान उधर उठा
थामकर जिगर उठा (कि जो मिला नज़र उठा) – २)
पर तभी यहाँ मगर, ऐसी कुछ हवा चली
लुट गई कली कली कि घुट गई गली गली
और हम लुटे-लुटे, वक़्त से पिटे-पिटे
शाम की शराब का खुमार देखते रहे, कारवाँ गुज़र…हाथ थे मिले के ज़ुल्फ़ चाँद की सवार दूँ
होंठ थे खुले के हर बहार को पुकार लूँ
दर्द था दिया गया के हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ के स्वर्ग, (भूमि पर उतार दूँ – २)
हो सका न कुछ मगर, शाम बन गई सहर
वो उठी लहर के ढह गये किले बिखर बिखर
और हम डरे डरे, नीर नैन में भरे
ओढ़ कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे, कारवाँ गुज़र…माँग भर चली के एक जब नई नई किरन
ढोल से धुनक उठी ठुमक उठे चरण चरण
शोर मच गया के लो चली दुल्हन चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पड़ा, (बहक उठे नयन नयन – २)
पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वह गिरी
पूंछ गया सिंदूर तार तार हुई चुनरी
और हम अजान से, दूर के मकान से
पालकी लिये हुये कहार देखते रहे, कारवाँ गुज़र…स्वपन झड़े फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये श्रृंगार सभी बाग के बबूल से
और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया गुब्बार देखते र

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