कृषि विभाग में प्रशासनिक सख्ती बेअसर?
विजय चौरसिया के आगे क्या कलेक्टर प्रीति यादव के निर्देश पड़ रहे हल्के?

रिपोर्ट – जहीर उद्दीन (सोनू) आगर मालवा।
एक्सप्रेस समाचार।
आगर मालवा जिले के उपसंचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास कार्यालय में इन दिनों प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं?
पिछले दिनों 28 जनवरी 2026 बुधवार को जिला कलेक्टर प्रीति यादव द्वारा उपसंचालक किसान कल्याण एव कृषि विकास कार्यालय का औचक निरीक्षण किया था। निरक्षण के दौरान कलेक्टर प्रीति यादव ने विभाग में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सख्त निर्देश जारी किए गए थे। लेकिन निरीक्षण के कई दिन बाद भी उन निर्देशों का धरातल पर पालन नहीं होने से ऐसा लग रहा है। जैसे जिला अधिकारी विजय चौरसिया को कलेक्टर का निर्देश सिर्फ हवा हवाई लगा होगा। सूत्रों के अनुसार, विभाग में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत आवश्यक व्यवस्थाएं अब भी अधूरी हैं, जिससे आमजन और किसानों को जानकारी प्राप्त करने में असुविधा हो रही है।
निरीक्षण में उजागर हुई थीं खामियां।
28 जनवरी बुधवार 2026 को हुए निरीक्षण के दौरान कलेक्टर प्रीति यादव ने कार्यालय की व्यवस्थाओं का बारीकी से अवलोकन किया था। निरीक्षण के समय यह पाया गया कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत अनिवार्य लोक सूचना बोर्ड न तो उचित स्थान पर लगा था और न ही उस पर आवश्यक जानकारी स्पष्ट रूप से अंकित थी। जिसको लेकर कलेक्टर ने मौके पर ही मौखिक रूप निर्देश दिए थे कि,
* लोक सूचना बोर्ड को कार्यालय के मुख्य द्वार या ऐसे प्रमुख स्थान पर स्थापित किया जाए जहां वह आमजन को सहज रूप से दिखाई दे।
* बोर्ड पर सहायक लोक सूचना अधिकारी एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी का नाम, पदनाम और अन्य आवश्यक जानकारी स्पष्ट एवं बड़े अक्षरों में लिखी जाए।
* सूचना का प्रदर्शन ऐसा हो कि किसी भी नागरिक या किसान को जानकारी के लिए भटकना न पड़े।
इन निर्देशों का उद्देश्य था कि विभाग में पारदर्शिता सुनिश्चित हो और सूचना का अधिकार अधिनियम की मूल भावना का पालन हो।
कलेक्टर के आदेशों के पालन पर उठे सवाल।
निरीक्षण को कई दिन बीत जाने के बाद भी यदि निर्देशों का पालन पूर्ण रूप से नहीं हुआ है, तो यह प्रशासनिक गंभीरता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है विभागीय अधिकारी विजय चौरसिया के कार्यकाल में आदेशों की अनदेखी की चर्चा प्रशासनिक गलियारों में भी सुनाई दे रही है?स्थानीय किसानों का कहना है कि उन्हें अक्सर विभागीय जानकारी, योजनाओं और आवेदन प्रक्रियाओं को लेकर स्पष्ट मार्गदर्शन नहीं मिलता। सूचना बोर्ड स्पष्ट स्थान पर न होने से उन्हें बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
सूचना का अधिकार अधिनियम की भावना पर असर
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का उद्देश्य शासन-प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करना है। यह कानून नागरिकों को यह अधिकार देता है कि वे सरकारी कार्यप्रणाली से संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकें।यदि किसी कार्यालय में सूचना बोर्ड ही स्पष्ट रूप से प्रदर्शित न हो, तो यह अधिनियम की मूल भावना के विपरीत माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की लापरवाही से प्रशासन की छवि प्रभावित होती है और आमजन का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
क्या होगी जवाबदेही तय?
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या जिला प्रशासन इस मामले में दोबारा निरीक्षण कर निर्देशों के पालन की समीक्षा करेगा?क्या संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण लिया जाएगा?या फिर मामला समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा।जिले में यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। किसान वर्ग और आम नागरिक यह उम्मीद कर रहे हैं कि कलेक्टर द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन सख्ती से सुनिश्चित कराया जाएगा और विभाग में पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जाएगी।
जिला प्रशासन की साख दांव पर
किसी भी जिले में प्रशासनिक व्यवस्था की मजबूती इस बात से तय होती है कि उच्च अधिकारियों के आदेशों का पालन कितनी तत्परता और गंभीरता से किया जाता है। यदि निर्देशों को अमल में लाने में ढिलाई बरती जाती है, तो यह केवल एक विभाग का मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की साख पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।फिलहाल कृषि विभाग का यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा बनता नजर आ रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाता है या फिर आदेश केवल आदेशों तक सीमित रह जाते हैं।

